अपनी बात || Apni baat

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मैं सुरभि हूँ… अपने नाम की तरह महकती, मचलती अपने माँ पापा के आँगन में उतरी, बचपन का हर दौर सुख से बीता.. पर एक कसक, एक फांस सी हमेशा चुभती, भला सुरभि का क्या परिचय हो सकता है ?

न वो दिखाई देती है न उसे छु कर महसूस किया जा सकता है और न ही सहेज कर रखा जा सकता है..

कभी कभी सोचती थी की मेरे माता-पिता ने क्या सोच कर मेरा नाम सुरभि रखा होगा?

फिर धीरे धीरे समझ बढ़ी, शब्द बढ़े, अनुभव बढ़ा, अनुभूति गहन-गंभीर हुई तब क़लम से कुछ शब्द यूँ ही फिसलते चले गए

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