अपनी बात || Apni Baat

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सुरभित हूँ मैं सुरभि हूँ
विश्व धरा पर फैली हूँ
चंद्र किरणें ज्यूँ धरा पर
मैं पुष्प पुष्प में महकी हूँ
कलियों संग भँवरे
राधा संग घनश्याम
व्यापक आकाश की मैं सहेली हूँ….

तब शायद पहली बार मैंने अपने आप को पहचाना, पापा की ऊँगली थाम कर चले, माँ के अंचल में खूब खेले, वो दिन अब कभी वापस नहीं आएंगे, पर माँ
और पिता का आशीष हमेशा मेरे साथ रहेगा

दुआओं में हमें भी शामिल रखना
सदाओं में हमें भी हाज़िर समझना

दर्द हमेशा एक मित्र की तरह रहा, वो दर्द कब मेरे क़लम के साथ जुड़ गया पता ही नहीं चला, आज लिखने बैठी तो यादों के मौसम और वो ज़ख्म हरे हो उठे

यादो के मौसम लौट चले
अब ज़ख्म हरे हो जायेंगे
ये दिल तुमको माँगेगा
हम ख़ुद को कैसे मनाएंगे ?

जिस रोज़ मेरी ऊँगली पिता ने छोड़ी, वही से संघर्ष और कठनाइयों ने मेरा दामन पकड़ लिया और तनहाई मेरी सखी सरीखी हो गयी पर शुक्र है उस ऊपर वाले का जो मेरे साथ रहा – हर पल हर दम

रहमत बख्श या मौला मैं ग़रीब
ग़रीब नवाज़ मदद
तू ही ख़ुदाया तू ही नूर
सब तुझ में समाया

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