अल्हदा रंग

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जाओ कहाँ जाओगे तुम,
मेरी परछाई वहाँ पाओगे तुम ,
दूर रहना मुमकिन ही नहीं,
मेरी सदाओं को सुन पाओगे तुम..

एक तेरे लिए हमने, 
किसी रोज़ तोड़ के,
घर छोड़ के चलना सीखा 
मुझ से अलग, कोई ताना बाना नही बुन पाओगे तुम …
जाओ कहीं भी, किसी ओर, 
हर बार ….मेंरी सदाओं को सुन पाओगे तुम..

रंगीन ज़माने के हसीं तसब्बर,
कुछ ख़्वाब सलोने 
मेरे भी हिस्से आये 
कुछ पल तेरे साथ, मैं भी जी लूं क्या ये नहीं चाहोगे तुम …
मेरे आशियाने के पंछी होकर,अनजान नगर कैसे रह पाओगे तुम ….

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