बोझ

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कुछ बोझ
ऐसे भी होते हैं,
जिनका
असर ताउम्र रहे तो भी अच्छा

वो ऐसा हो ,
वैसा हो ,
कैसा भी हो,
बस साथ रहे वो भी अच्छा

अपना तो
कोई अस्तित्व
नही दीवार का ,
एक छत ही
उसे मकान बनाती हैं

 

 


मेरे हमदम का
मुझे मिल जाता साथ,
धरती सोचती है,
पर फिर ख्याल आता है उसे-

कुछ नहीं ……. न सही
मेरे सर पर
ये ठहरा हुआ आसमान भी अच्छा

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