शायद दोबारा जी उठूँ

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ज़िन्दगी का सफर एक छोटे शहर से शुरू किया 
जहाँ की आवो हवा आज भी मुझे आवाज़ देती हैं … 
 
रेडियो पर पुराने गानों को सुनने का शौक इस क़दर हावी रहता था कि 
बयां करना आसान नहीं है … 
 
रात 12 बजे से 1 बजे तक छत पर चांदनी रात में अकेले बैठ कर 
रेडियो सुनती और माँ की डांट खाती रहती ..
 
10 साल में सब बदल गया .. न वो घर रहा, न वो छत रही, न वो 
रेडियो रहा और न मैं ही वो नन्हीं गुड़िया रही …
अरे हाँ मेरा घर में प्यार से बुलाया जाने वाला नाम जिसे वक़्त की 
आँधियाँ न जाने कहाँ उड़ा ले गयीं थी … आज एक एक करके वो सब 
याद आ रहा है …कभी कभी न जाने क्या हो जाता है मुझे … सारी 
दुनिया को खुशियां देने वाली … मोटिवेशन देते देते खुद के लिए 
निराशा से भर उठती हूँ …
 
शायद यही है जीवन का वो चक्रव्यूह जिसमें फंस कर निकल पाना 
आसान नहीं ……
 
अभिमन्यु की तरह प्राण देकर ही शायद दोबारा जी उठूँ ….
 
दर्द लिखना नहीं चाहती पर… न जाने कहाँ से शब्द मुझ तक आते हैं …. 
दर्द को दवा बना कर पी लूँ तो शायद दोबारा जी उठूँ ….. ‪
 
#‎Surbhhi‬
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