सफ़र

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इस सुहाने मौसम में
जब तय किया
एक सफ़र
आप तक पहुँचने का ..

दो गिलहरियाँ भागती देखी ,
एक कौवे का जोड़ा
ढूंढ़ रहा था जैसे कुछ
कुछ गौरैया कलरव करती
अपने घर को, लौट रही थीं
चहक चहक के, लहक लहक के

हलकी बूंदा बांदी ने
पेड़ों को फिर हरे रंग में रंग डाला
जो ताजी खुशबू
वो मेरे मन को मोह रही थी

ठंडी हवा के ताज़े झोंके,
हरी पत्तियों संग खेल रहे थे
प्रकृति के इस मनमोहक वन में
काश हमारे साथ वो होते
हर पल, प्रतिपल
ये ही कल्पना
मेरे मन को कचोट रही थी
………….

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