सार

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मेरा चेहरा नहीं
दिल पढ़ो तो कोई बात है
किताबी बातों में
कोई सार कहाँ रखा है

कभी तो कोई गुलाबी शाम
मेरे भी हिस्से होगी
सपनों में ही जी लूँ
कुछ शब्, कुछ मंज़र मैं
हक़ीक़त की दुनिया में
गुलो-गुलज़ार कहाँ रखा है

 


है समंदर के धारों पे ज्यों रेत का घर,
शमा के तले ज्यों अधेरा घना है
ढूँढे वही, जो कस्तूरी फिरते लिए है ….
यही तो हकीकत है सारे जहाँ की
ऐसे ही सपने है जो देखे हमने,
पर हक़ीकत की दुनिया में
प्यार कहाँ रखा है !

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