सज़ा

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दर्द तो अपना है
मज़ा देता है
वो तो पराया है ,
ये स्वर सज़ा देता है

खनक बनकर वो मेरे दिल में
कुछ यूँ मचले,
जैसे की कोई सागर लहर हो
जब भी वो मुस्कुराये,
बहारों  के मौसम आये,
ख़ुशबू
ज़ुल्फों से उठ चली
और फूलों पर भँवरे गुनगुनाए

तकल्लुफ़ मिटाते तो दूरियां भी घटती
मैं  तुम  होती और  तुम मैं  हो जाते,
ये स्वप्न मज़ा देता है

मैं तुमको शब्दों में बाँध लेती
जो तुम लहरों में सिमट आते,
सारी दुनिया से बग़ावत हम कर लेते,
जो एक बार तुम मेरे हो जाते

दर्द तो अपना है मज़ा देता है
वो तो पराया है , ये स्वर सज़ा देता है

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